ममता का आँचल दे

ढूढ़ा बाग़ बहुत पर

वो फूल न चुन सकी

जो फूल चढ़ाऊ माँ तुझ पर

तेरा द्वार न पा सकी अब तक

मै भटक रही हूँ मै दर -बदर

मुझ में ही है कोई दोष माँ !

तुझको ये मन न कर सकी अर्पण

तू मुझको देख रही है कब से

मै ही तेरे दर्शन को प्यासी अब तक

क्या दुःख है क्या सुख और क्या भूल मेरी

मैं निकल न सकी इस भवर से अब तक

दिन खोया चाँदी सोने में

राते कांटी है बेसुध सोने में

अब सुमिरन आया है माँ तेरा

ठोकर न लगी थी जब तक

दिन रात के बीच माटी के

तन को लिए फिरती

पल पल मैया थामा तुने मुझको

मेरा साया भी जब पास न था मेरे

सदियों से घर से बेघर हूँ माँ

तू ही अब राह दिखा माँ

तुझ बिन अब कोई नही मेरा

शीतल छावं दे माँ

ममता का आँचल दे

तुझ बिन कुछ न जाना मैंने

अब तू ही है मैया मेरी ………!!

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