Heart Touching Poems On Nature in Hindi | प्रसिद्ध प्रकृति पर कविता

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Top Poems On Nature in Hindi: दुनिया में सबसे खूबसूरत चीज जिसे मानवता ने सदियों से उपेक्षित किया है, वह है प्रकृति। लोग अक्सर इसके बारे में भूल जाते हैं लेकिन जब वे नोटिस करते हैं तो वे इसकी सुंदरता में खो जाते हैं। लेकिन आप कितनी बार समय निकालते हैं और प्रकृति का हिस्सा बनने का आनंद लेते हैं? हमें प्रकृति की याद तभी आती है जब हम दिन-ब-दिन थके या निराश होते हैं। हमें प्रकृति के बारे में तभी याद आता है जब हमें प्रकृति को अपने उद्देश्य के लिए चाहिए। हमारे पास जो कुछ भी बिना किसी कारण के है, उसे संजोने के लिए हम प्रतिदिन कुछ समय क्यों नहीं निकाल पाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं है और हम में से कुछ अब प्रकृति को संजो सकते हैं लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा हम अपने सामान्य जीवन में वापस आ जाएंगे। उन लोगों के लिए जो प्रकृति की सुंदरता को संजोना चाहते हैं लेकिन ऐसा करने में असमर्थ हैं और प्रकृति पर इस कविता को अंग्रेजी में पढ़ें, सुंदर लघु वातावरण और प्रकृति कविता जो इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है।

Poems on Nature in Hindi: इस पोस्ट में हम प्रकृति पर कुछ खूबसूरत कविताएँ लिखने जा रहे हैं। हम आशा करते हैं कि हर कोई इसे विशेष रूप से उन छात्रों को पसंद आएगा जिनके पास प्रकृति पर आधारित विषय है। उन्हें हमारी माँ प्रकृति के और करीब लाने के लिए। तो चलिए शुरू करते हैं..

Heart Touching Poems on Nature in Hindi

1. पेड़

“इक छोटा सा बीज हुआ करता था कभी,
रौंदते थे आने जाने वाले सभी,
फिर भी आलोचना ना की मैंने कभी”

“नन्हा पौधा हुआ करता था कभी,
तोड़ते मरोड़ते थे आने जाने वाले सभी,
फिर भी बढना ना छोड़ा मैंने कभी”

“इक विशाल पेड़ हुआ करता था कभी,
आने जाने वाले आश्रय लेते थे सभी,
पक्षी अपने घोसले,
मनुष्य रहा करते थे सभी”

“ठण्ड से बचाने , खुद को आग लगाया ,
सूरज से तपकर, फिर भी मैंने दी छाया ,
मूसलाधार से लड़कर मैंने ही था बचाया ,
भूख मिटाता था मैं कभी,
फिर भी पत्थर मारते थे सभी”

“काट डाला, मार डाला,
मतलबी है यहाँ सभी,
लोग कहते है अब,
सड़क के बीचो-बीच
एक विशाल पेड़ हुआ करता था कभी!”

शीतलेश थुल

2. बाढ़

नदियों के बहाव को रोका और उन पर बाँध बना डाले,
जगह जगह बहती धाराएँ अब बन के रह गई हैं गंदे नाले,
जब धाराएँ सुकड़ गई तो उन सब की धरती कब्जा ली,
सीनों पर फ़िर भवन बन गए छोड़ा नहीं कुछ भी खाली,
अच्छी वर्षा जब भी होती हैं पानी बाँधो से छोड़ा जाता है,
वो ही तो फ़िर धारा के सीनों पर भवनों में घुस जाता हैं,
इसे प्राकृतिक आपदा कहकर सब बाढ़ बाढ़ चिल्लाते हैं,
मीडिया अफसर नेता मिलकर तब रोटियां खूब पकाते हैं

शिशिर मधुकर

3. बिन कुएं का पानी ।

तू आया था उन बादलों की तरह ,
जो बरस कर चला गया,
धरती फिर भी प्यासी रही ,
बिन पानी रेतीले इलाकों तरह।

आया तो था,
बिन कही बातों की तरह,
जरा सी हवा ले गई तुझे,
तेज तुफानो की तरह!

ऐ हवा कबी आ ठहर कर ,
कुछ जी लू मैं तुझे भी ,
क्यों बुझ जाता है तू ,
लिखे हुए रेत मैं अफसानों की तरह!

कभी मेरी भी प्यास बुझे,

कबी तो सुनाऊं दिल का हाल तुझे,
देख जरा कबसे रुकी हुई हूं,
तू क्यों भागता है क्रजदारों की तरह!
देख जरा मेरा भी और,

धरती हु मै तेरी,
कर दे इस तरह मुझे,
फूल सी मेहकू ही और,
बना दे मुझे भी भगदारों की तरह।

अबकी आ तो बरस के जा
रहूं न मैं विरानो की तरह,
तरस गई हु,
में बिन पानी के कुऐ कि तरह।

बिन कुएं का पानी। - Poems on Nature
बिन कुएं का पानी। – Poems on Nature

Poems on Nature in Hindi by Famous Poets

1. ऋतुओं के संग-संग

ऋतुओं के संग-संग मौसम बदले,
बदल गया धरा पे जीवन आधार,
मानव तेरी विलासिता चाहत में,
उजड़ रहा है नित प्रकृति का श्रृंगार,
दरख्त-बेल, घास-फूंस व् झाड़ियाँ,
धरा से मिट रहा हरियाली आधार !!

खोई है गौरैयाँ की चूँ-चूँ, चीं-चीं,
छछूंदर की भी, खो गयी सीटी,
मेंढक की अब टर्र-टर्र गायब है,
सुनी न कोयल की बोली मीठी,
खग-मृग लुप्त हुआ जाता संसार !
मिट रहा है मधुकर श्रेणी परिवार !!

तितलियाँ जाने कहां मंडराती है,
टिड्ढो की टोली अब न आती है,
भंवरों की गुंजन को पुष्प तरसते
अब न बसंत में फूल ही बरसते
लील गया मानव का अत्याचार !
उजड़ रहा है नित प्रकृति श्रृंगार !!

चहुँ ओर दिखता पानी पानी,
मानस मन करता त्राहि त्राहि,
अपनी ओर भी देख् रे प्राणी,
तेरी करणी तुझको ही भरणी,
खुद ही झेलो अब इसकी मार !
क्यों किया प्रकृति का त्रिस्कार !!

लोलुपता मे मन्त्र मुग्ध है,
ज्ञान चेतना मे तू प्रबुद्दः है,
अज्ञानता से रे मानुष तेरी,
चित्त प्रकृति का क्षुब्द है,
कब तक सहेगी ये तेरी मार !
अब तो कर तू, कुछ विचार !!

खुद को समझ रहा बड़ा दानिश,
क्या देगा गर मांगेगा वारिसः
आने वाले क्षण कि भी सोच,
मिट रही है यह सम्पदा रोज,
मनमानी की होगी सीमा पार !
कभी तो मानगे तू अपनी हार !!

जाग सके तो जाग रे बन्दे,
कम कर ये विध्वंशक धन्धे,
अभी न चेता तो कब चेतेगा
पड़ जायेंगे, आफत के फंदे,
कभी तो सुन मन की पुकार !
कर रही है अंतरात्मा पुकार !!

बाढ़, सूखा, वर्षा, माहमारी,
आएगी बीमारियों की बारी,
बंद कर छेड़छाड़ प्रकृति से,
मारी जायेगी दुनिया सारी,
कोई न सुनेगा यहां तेरी हाहाकार !
प्रकृति लेगी जब अपना प्रतिकार !!

डी के निवातिया

2. सावन का विज्ञान

सावन का महीना ज्यों ज्यों ही पास आता हैं,
उमस भरा मौसम सकल लोगों को सताता हैं,

गोरियां राहत के लिए जो उपाय अपनाती हैं,
उस से तो सावन में उमंगों की बहार आती हैं,

झूलो का पड़ जाना मरा एक निरा बहाना है,
असल खेल तो खुद को तपिश से बचाना है,

मेहंदी के लाल रंग जब हाथों में लग जाते हैं,
उबलते बदनो को वो ठण्डी राहत दिलाते हैं,

झूलो के करम से सब पीड़ाएँ जब मिटती हैं,
सजना से मिलन को फ़िर हूक सी उठती हैं

इशारों में गा गा कर जो मन के भेद बताते हैं,
वही सब तो सावन के मधुर गीत कहलाते हैं,

गोरी के मायके से मिठाइयां जो भी आती हैं,
वो भी तो पाक मिलन की खुशियां मनाती हैं।

शिशिर मधुकर

Poems on Nature in Hindi by Rabindranath Tagore

1. बादल और लहरें

माँ, बादलों में रहने वाले लोग मुझे पुकारते हैं-
जब से हम जागते हैं
तब तक हम खेलते हैं दिन समाप्त होने तक।

हम खेलते हैं सोने की सुबह के साथ,
हम खेलते हैं चाँदी के चाँद के साथ।
मैं पूछता हूं,
“लेकिन मैं आपके पास कैसे जाऊं?”
वे उत्तर देते हैं,
“पृथ्वी की छोर पर आओ,
और अपने हाथ आकाश की ओर उठाओ,
और तुम बादलों पर उठा लिए जाओगे।”

“मेरी माँ घर पर मेरा इंतज़ार कर रही है,”
मैं कहता हूँ,
“मैं उसे छोड़कर कैसे आ सकता हूँ?”
फिर वे मुस्कुराते हैं और तैर जाते हैं।
लेकिन मैं इससे अच्छा खेल जानता हूं, मां।
मैं बादल बनूँगा और तुम चाँद।
मैं तुम्हें अपने दोनों हाथों से ढँक दूंगा,
और हमारे घर का शिखर नीला आकाश होगा।

लहरों में रहने वाले लोग मुझे पुकारते हैं-
“हम सुबह से रात तक गाते हैं,
हम चलते-फिरते हैं और नहीं जानते कि हम कहाँ से गुजरते हैं।”

मैं पूछता हूं,
“लेकिन मैं आपके साथ कैसे जुड़ूं?”
वे मुझ से कहते हैं,
कि तट के छोर पर आ,
और आंखें मूंदकर खड़े रह,
और तू लहरों पर चलाया जाएगा।

मैं कहता हूं,
“मेरी मां हमेशा मुझे हर चीज में घर पर चाहती है-
मैं उसे छोड़कर कैसे जा सकता हूं?”
वे मुस्कुराते हैं,
नाचते हैं और गुजरते हैं।
लेकिन मैं इससे बेहतर खेल जानता हूं।
मैं लहरें बनूंगा और तुम एक अजीब किनारे बनोगे।
मैं आगे-पीछे लुढ़कूंगा,
और हंसते-हंसते तुम्हारी गोद में टूटूंगा।
और दुनिया में किसी को पता नहीं चलेगा कि हम दोनों कहां हैं।

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Short Poems in Hindi on Nature

1. बसंत

अगर तू है मेरे साथ तो हर पल
बसंत है वरना मेरी पीर का ना कोई भी अंत है
हर बार ये मौसम यही सन्देशा देता है
प्रेम के भीतर ही बसा आनंद अनंत है।

शिशिर मधुकर

2. बसंत आने को है

निम्नलिखित कविता डी. के. निवतिया द्वारा लिखी गई है।

दीपशिखा के चंचल चरण
करने चले है फागुन वरण
शीतल ज्वाला से अपनी
सौरभ मधु बरसाने को है
सुना है ! बसंत आने को है !!

हर इक मन में उमंग प्रवाह
शीतलता करती मधुर दाह
मनभावन सौंदर्यता से अब
मनवा मधुर लुभाने को है
सुना है ! बसंत आने को है !!

अमवा के अंकुर पनपने लगे,
पुष्प टेसू, सरसों खिलने लगे,
नए दौर के नए किस्से देकर,
पुरानी पाती विदा होने को है
सुना है ! बसंत आने को है !!

डी के निवातिया
बसंत आने को है - Poems on Nature
बसंत आने को है – Poems on Nature

जो कभी नई कोंपलो में दिखता थाकलियों में फूल बनकर खिलता थाहवाओ संग ख़ुशबू लिए फिरता थाचेहरों पे नई उंमग लिए मिलता था मगर ये रूप दिखाने को तरसता हूँआज सिर्फ जुबानो में मिलता हूँ !!हाँ, मै, वही बसंत हूँ जो बातो में मिलता हूँ आजकल सिर्फ, मै, किताबो में मिलता हूँ !!

जिससे फैसले लहलाती थीबागो में हरियाली छाती थीतितलियाँ फूलो मंडराती थीगुनगुनी धूप मन लुभाती थीअब वो फ़िज़ा बिखराने को तरसता हूँआज सिर्फ बधाई संदेशो में मिलता हूँ !हाँ, मै, वही बसंत हूँ जो बातो में मिलता हूँ आजकल सिर्फ, मै, किताबो में मिलता हूँ !!

पेडों की पुरानी पत्तियाँ झड़ती थीनई नई कोमल पत्तियां उगती थीअमवा पे बोर मंजरिया फलती थीकोयल की पीहू पीहू रट लगती थीमगर अब उस आवाज को तरसता हूँआज सिर्फ दिखावे कही पर मिलता हूँ !हाँ, मै, वही बसंत हूँ जो बातो में मिलता हूँ आजकल सिर्फ, मै, किताबो में मिलता हूँ !!

बसंत ऋतू संग, फाग का आना नर-नारियो का फाग गीत गानासुनहरी बालियों से खेत लहलाना सरसो के पीले-२ फूलों का छा जाना वो मधुमास छलकाने को तरसता हूँ पल पल वो पल जीने को मचलता हूँ हाँ, मै, वही बसंत हूँ जो बातो में मिलता हूँ आजकल सिर्फ, मै, किताबो में मिलता हूँ !!

Famous Poems about Nature

1. वृक्ष धरा के हैं आधार

वृक्ष धरा के हैं आधार,
रोकें इन पर अत्याचार।
वृक्ष की जब होगी वृद्धि,
चारों और होगी समृद्धिन करो पर्यावरण का निरादर,

ये है धरती का अपमान।
हर पेड़ हर पौधा इस धरती का सम्मान।
वृक्ष लगाकर पर्यावरण का संरक्षण ऐसा करना,
दुष्ट प्रदूषण का भय भू पर न दिखाई दे,
जड़ी बूटियां औषधियों की बस भरमार दिखाई दे।

वृक्ष धरा के हैं आधार,
रोकें इन पर अत्याचार।
वृक्ष की जब होगी वृद्धि,
चारों और होगी समृद्धि।

मिट्टी पानी और बयार,
ये है जीवन के आधार।
वृक्ष अगर हो हरे भरे,
तो हम क्यों अकाल से डरें।

वृक्ष काटना है बेईमानी,
सदा बरसाते भू पर पानी।
प्राचीन काल में थी धरती हरी भरी,

किसान था इस धरती का भगवान।
मां की तरह संवारा उसने धरती को,
पर समय का फेर ऐसा आया।

मनुष्य बना स्वार्थी,
भूल गया अपना कर्तव्य।
पर फिर वह समय आया,
मिलकर है लेना हमें संकल्प।
धरती मां को फिर बनाना है,
हरा भरा व खुशहाल।।

2. हे पवन !

हे पवन !
तू है बड़ी चंचल री,
छेड़ जाती है,
अधखिले पुष्पों को…!

है जो चिरनिंद्रा में लीन,
सुस्ताते हुए डाल पर,
तेरे गुजरने के बादविचलित हो उठते है,
नंन्हे शिशु की मानिंदतरस उठते है,
जैसे झुलसते हो तपिश में,
निःस्त्रवण में लथपथ,
पुन:जागृत होती अभिलाष,
भीनी-भीनी मृदु,
चैतन्यसुधा से परिपूर्ण,
बहती फुहार के लिए….!

जैसे!
कुम्हलाता शिशु,
विचलित होने लगता,
मातृत्व की सुगंध मात्र से,
अतृप्त रहता,
जब तकमहन्तिन उर स्पृश न मिले,
ठीक वैसे ही,
रहता है लालायितउत्तरगामी क्षण के लिए,
फिर आता एक और झोंकाकरा जाता आनंदानुभूति,
उस मुक्त वैकुंठ,
अमरावती केसुखद क्षणज्योति की,
क्षण मात्र का आयुष्यदे जाता है सहस्रो,
कोटिशवर्षो के जीवन का आनंद,
यकायक,
अनायास..पुन: हो जाता उर्जायमान,
बदल लेता स्वरूप,
स्वछंद हो,
कब पुष्प बन,
सजाने लगता है भूलोक,
महकने लगता है रोम-रोमअंतत: स्वय भी बहने लगता हैपवन में समाहित होकर,
सृष्टि के कण-कण मेंरम जाता है !

इस अनन्य पल के जीने की कलापुष्प के अन्यत्र,
कौन जान सकता है !
धन्य हो तुम !
हे पवन! प्राणदायिनी !
नमन तुम्हे !

डी० के० निवातिया

Read More: Best Poems on childhood in hindi | बचपन पर कविताएँ हिंदी में [2022 Updated]

3. अब तो मचा है हाहाकार

अब तो मचा है हाहाकार,
वृक्ष बिना बुरा हुआ है हाल।
मानव ने यह किया कमाल, ख़ुद को पाएं नहीं सम्हाल।
कैसे-कैसे अब किए हैं खेल?,
हाल बुरा है पेलम-पेल।

गर्मी ने किया बुरा है हाल,
आज ग्लोबल हुआ है लाल।
ग्लेशियर पिघले हालम-हाल,
ख़ुद को पाया नहीं सम्हाल।
नदियों में इसने फेंका है ज़ाल,
हर घर में आया है काल।

उमड़ी, उफ़नी और लाईं बाढ़,
धरती लगी अब आँखें काढ़।
ओज़ोन परत भी हुई अब चीर्ण अब पराबैंगनी हुई है प्रकीर्ण।
प्रदूषण ने सबको किया है क्षीण,
शरीर हो चुका अब सबका जीर्ण।
वृक्ष कटाई से हालात हुए ख़राब,
इन सबका देगा कौन ज़वाब।

सर्वेश कुमार मारुत
अब तो मचा है हाहाकार - Poems on Nature in Hindi
अब तो मचा है हाहाकार – Poems on Nature in Hindi

प्रकृति पर कविता

1. बसंत बहार

बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे !गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

भोर में रवि की किरण पे आये लाली कोयल कूक रही हो अमवा की डालीपेड़ो पर नई नई कोपले निकलने लगेऔर आँगन में भी गोरैया चहकने लगे समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे !गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

गुलाब, गेंदा, सूरजमुखी, सरसों आदि के फूलतितलियाँ और भँवरे उनपर मंडराये झूम झूम,फूलों की सुगंध से मादकता का भान होने लगे मनमोहक हो फिजा का आलम गुदगुदाने लगे समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे !गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

पेडों से पुरानी पत्तियाँ झड़ने लगती हैं उन से कोमल पत्तियों उगने लगती हैंउल्लास -उमंग का आभास होने लगे बसंत दूत कामदेव भ्रमण करने लगे समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे !गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

ब्रज धाम में गोपियाँ नृत्य करने लगे कृष्ण प्रेम डूब राधा रूप वो धरने लगे देखकर ये विहंगम दृश्य राधे-श्याम स्वर्ग से जमीं की और पग धरने लगे समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे !गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार आ गयी !!

डी. के. निवातिया

2. सुनामी

एक ऊंची लहर आती है,
साथ बर्बादी लाती है,
पीछे तबाही का मंजर छोड़,
साथ सबकुछ ले जाती है,

गगन चुम्भी इमारते,
ये विशाल विशाल पेड़,
कल तक मेरे सामने,
बनते थे जो शेर,
हिम्मत उनकी भी हार जाती है,
जब एक ऊंची लहर आती है,

चाचा के चाय दूकान का तम्बू उड़ने लगता है,
सागर का खारा पानी,
जब हिचकोले लेने लगता है,
आसमां को छूती पर्वत श्रृंखलायें भी डर जाती है,
जब एक ऊंची लहर आती है,

मौतों की मौजो पे बैठ,
वो सबको गले लगाती है,
एक ऊंची लहर आती है,
जो सुनामी कहलाती है।

शीतलेश थुल

प्रकृति का एक संदेश (कोरोना कोविड -19)

कोरोना महामारी नहीं,प्रकृति का एक संदेश लेकर आया है।
जिसने प्रकृति के दुश्मनों को आज चेताया है।।

जो लोग दूर जाकर प्रवासी हो गए थे।
उनको आज फिर से अपनों से मिलवाया है।।

बागों से पेड़ों का कटान हमेशा से होता रहा।
कटान को रुकवा कर आज, बागों में कोयल को कूकाया है।।

वन्य जीवो की भूमी, जो इंसानों ने कब्जा ली थी।
आज कोरोना ने उनकी, भूमि को वापस लौट आया है।।

जिन रंगों को हम अपने स्वार्थ के लिए भूल चुके थे।
आज वह रंग उड़ते पक्षियों,तितलियों और खिलते फूलों में दिखाया है।।

जो लोग जिंदगी की दौड़ में बेवजह भागे जा रहे थे।
कोरोना ने आज उन्हें, रुक कर आगे बढ़ना सिखाया है।।

जो लोग बेवजह अन्न की बर्बादी किए जा रहे थे।
कोरोना ने आज उन्हें, अन्न का सम्मान करना सिखाया है।।

प्रकृति के दुश्मनों सुधर सकते हो,तो अभी भी सुधर जाओ।
वरना कोरोना ने तो बस अभी सपना सा दिखाया है।।

अंतिम शब्द

प्रकृति वह उपहार है जो मानवता को मिला है। हमें इसका ख्याल रखना चाहिए।
तो प्रकृति पर हिंदी में कविताओं के लिए यह बहुत कुछ है। हम अगले लेखों में कुछ और रोचक कविताएँ Share करेंगे।

Sahitya Hindi
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Sahitya Hindi

हिंदी साहित्य काव्य संकल्प ऑनलाइन पोर्टल है और हिंदी कविताओं और अन्य काव्यों को प्रकाशित करने का स्थान है। कोई भी आ सकता है और इसके बारे में अपना ज्ञान साझा कर सकता है और सदस्यों से अन्य संभावित सहायता प्राप्त कर सकता है। यह सभी के लिए पूरी तरह से फ्री है।

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One thought on “Heart Touching Poems On Nature in Hindi | प्रसिद्ध प्रकृति पर कविता

  1. […] on Spring in Hindi: हमने पिछले पोस्ट में प्रकृति पर कविताओं के कुछ बेहतरीन संग्रह […]